
हर बार सन्नाटे भरे अंधेरे में, जब लगता — अब दिल डूब ही जाएगा, ऐन तभी मुस्कुराती दिखीं वे आंखें। दर्द से फटते माथे पर फिरती रहीं मखमली अंगुलियां। गुनगुनाती थी एक मीठी आवाज और उतर जाती थी नस-नस में। खुशी में, पीठ पर धौल जमाती हुई, हर सफर में साथ चलती हुई वह.. क्या था उसका नाम? वह कौन थी? वह छुअन क्या सच में वैसी ही होगी? वे आंखें उतनी ही जादुई होंगी, असल में भी? कैसा था एक अनजान साथ? कितनी दूर, नींद में संग-संग चलते रहे, किसी मोड़ पर अलग हो गए जो! क्या वह एक सुहाना भरम भर था या कहीं-कोई सच्चाई थी?
सपनों जैसा यह नजारा आखिर है क्या? महज एक घायल । उभरता है, उसके होने का एहसास, जो दरअसल, कहीं है ही नहीं। लड़के तलाशते हैं सपनों में ड्रीमगर्ल और लड़कियों की सोच में दाखिल होता है, सफेद घोड़े पर बैठा एक राजकुमार।
खुली आंख में जागता एक सपना
आज में, गुजरे कल के पन्नों पर — हर जगह अनजानी आस के पीछे हमारा भागना-दौड़ना बना है। कहीं, किसी रोज, किसी मोड़ से गुजरते हुए, कभी कोई आवाज नाम लेकर पुकारती है। हम ठिठकते हैं, मुड़ते हैं और ठहरते हैं, उस आवाज का चेहरा तलाश लेने के लिए, तभी पाते हैं कि वहां कोई नहीं है! एक, केवल भावनाओं में है। उसका कोई जिस्म नहीं। दरअसल, कोई आवाज भी नहीं। सिर्फ, एक सोच है, जो घेरे हुए है।
हम प्रेम में होते हैं, तब कहते हैं — ‘हां! तुम वही हो, जिसे मैंने वाबों में देखा था’, लेकिन यह बात सच्ची नहीं होती। प्रेम में ज्यादातर बार एक इंसान अपने साथी पर इच्छाओं का चेहरा थोप रहा होता है। यह भी एक रिश्ता है — कल्पना और कामनाओं का, ज़िन्दगी में आने वाले बाकी लोगों से बना अनूठा रिश्ता। यह रिश्ता स्वीकार्य नहीं होता। कुछ लोग ऐसे संबंध यह कहकर तोड़ देते हैं कि तुमने अपनी कल्पना मेरे अस्तित्व पर थोप दी है, पर ऐसी कोशिशें फिर भी होती हैं बार-बार। आखिर, कोई अपनी कल्पनाओं को एकदम नकार भी नहीं सकता न!
यह कोई नई बात भी नहीं है। बहुत पहले सुनी थी कुछ कहानियां। किसी ने एक सुंदर स्त्री की तारीफ सुनी। उसके रूप की, रंग की, स्वभाव की बातें जानीं और यूं ही मिले बिना, बस बैठे-बैठे दिल दे बैठा। ऐसा होना मुमकिन नहीं लगेगा, पर इतिहास के पन्ने, कहानियों के सफे बताते हैं — दिल के लेन-देन का कारोबार जिस्म के होने से ताल्लुक नहीं रखता। कुछ लोग कहेंगे — यह मृगमरीचिका के सिवा कुछ नहीं, पर क्या करें, दिल ही तो है, सो बहुत से इंसानों के लिए उनकी कल्पनाएं बड़ी हैं, सच्ची हैं और सुंदर भी हैं।
मलिक मोहम्मद जायसी ने मसनवी शैली में एक प्रबंध काव्य रचा है — पद्मावत। 57 खंडों में एक प्रेम कहानी है। पद्मावती और रत्नसेन की प्रेमकथा। पद्मावती के घर में एक सुग्गा (तोता) हीरामन पला था। बचपन से ही दोनों एक-दूसरे के साथी बन गए। पद्मावती बड़ी हुई। एक बार, कुछ ऐसा घटा कि वही सुग्गा किसी तरीके से पहुंच गया। के राजा ‘रत्नसेन’ ने उसे अपने पास रख लिया।
एक दिन रत्नसेन शिकार के लिए गया। तोते ने उसकी रानी नागमती को बता दिया कि दुनिया में सबसे ज्यादा सुंदर पद्मावती ही है। अब उसकी जान पर बन आई। किसी तरह प्राण बचे तो सुग्गे ने राजा को भी पद्मावती के रूप के बारे में विस्तार से बताया। कितना ही समय बीत गया, लेकिन सुग्गा थका नहीं। वह पद्मावती के बारे में बोलता रहा। वह कहता गया और रत्नसेन सुनते रहे। वह इस बयान से इतना मुग्ध हुआ कि सारा राज पाट छोड़कर पद्मावती की तलाश में जोगी बनकर महल से निकल पड़ा। कहानी जानी पहचानी है, लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया — यहां भी एक खिंचाव था, एक तलाश थी, एक यात्रा थी। किसी अनजानी चाह से वशीभूत होकर राजा ने वैभव त्यागा, अपनी सांसारिकता छोड़ी और प्रेम की खोज में दर-ब-दर भटकने लगा।
हर मोहब्बत का अंजाम जुदाई क्यों है?
सैंणी और बीझा की मशहूर कहानी सुनी है आपने? कहां के हैं दोनों, यह छोड़िए, बस कहानी याद कीजिए। पनघट पर पानी भरते हुए सैंणी से बीझा ने पानी पीने के लिए मांगा और उसने दिल तोड़ने वाले अंदाज में मना कर दिया — ‘न, न, तुम्हारे लिए पानी नहीं!’ इस पर भी जुल्म यह कि एक कौए को पानी पीने दिया। बीझा कलश छू लेता तो वह अपवित्र हो जाता, पर कौए से कोई दुराव नहीं! बाद में वही सैंणी बीझा के इंतजार में अपनी देह पहाड़ों में गला बैठी। उनके मिलने का कोई संयोग नहीं था। ईश्वर ने कोई दिन ऐसा रचा ही नहीं था, जब उनका मिलना नियति के पन्नों पर लिखा जा सकता, लेकिन एक प्रतीक्षा थी, वही अपरिभाषित उम्मीद , जिसके लिए सैंणी सांस रोके बीझा के इंतजार में बैठी रही। बाद में वे मिले, लेकिन सैंणी की जान जाती रही। रेगिस्तान में पानी तलाशता है यह मन। पतझड़ में वसंत के आने की आहट सुनता है। बंजर धरती पर फूलों की खेती करने को अकुलाता है। यही अकुलाहट, ऐसी ही प्रतीक्षा और इसी किस्म का उद्वेलन उन उम्मीदों को जन्म देता है, वैसी तसवीरें रचता है, जिनका कोई आधार नहीं, जिनकी कोई नियति नहीं।
मूमल महेंद्र का अफसाना भी सुन लीजिए। अमरकोट के राणा वीसलदे का बेटा था महेंद्र। एक दिन शिकार करते हुए काक नदी के किनारे पहुंच गया। झोपड़ी से मूमल ने उसे देखा। उसने दास दासियों से कहा — उस, खूबसूरत नौजवान का आतिथ्य करो। चलते वक्त महेंद्र ने एक युवती से पूछा — हम किसके मेहमान हैं? युवती मूमल की सहेली थी। उसने मूमल के रूप गुणों स्वभाव की तारीफ में शब्दों की नदी बहा दी। वहां पहुंचे नाई ने तो यहां तक कह दिया — मूमल शीशे में खुद को देखती है तो शीशा चटक जाता है। चांद शरमा जाता है। भगवान ने उस जैसी कोई लड़की नहीं बनाई। यह सुनकर महेंद्र दिल हार बैठा। इसके बाद की कथा सब जानते हैं, वह ये कि बड़ी जद्दोजहद के बाद दोनों मिले। इस कहानी का अंत भी दुखांत हुआ.. शक के जहर ने उनकी मोहबत की सांसें छीन लीं.. लेकिन मूमल अंतिम क्षण तक इस उम्मीद से जूझती
रही — महेंद्र कभी तो समझेगा कि मेरा प्रेम क्या है?
एक तरफ महेंद्र मूमल की प्राचीन कथा, दूसरी ओर निशा-राजेश की नई लव स्टोरी। निशा और राजेश कुछ साल तक प्रेम संबंध में रहे, पर यह प्रेम था ही नहीं। एक स्त्री अपने बीते रिश्तों को भुलाने के लिए अपना ठहराव ढूंढ़ रही थी और दूसरी तरफ पुरुष अपना प्रेम तलाश रहा था। कटुता, आरोपों और ग्लानियों के बीच दोनों अलग हो गए। चार साल से वह नहीं मिले। कभी दिखे भी एक-दूसरे को अजनबियों की तरह। दोनों अलग होकर भी जुदा नहीं हुए। उनकी स्मृतियों में वह समय, वह साथ ठहरा हुआ है। हां, उनके लिए उसके मोल अलग अलग हैं। पुरुष को प्रतीक्षा है, वह लौटेगी। स्त्री जानती है — उसका फिर वहां आना संभव नहीं।
इच्छाएं अपनी यात्राओं के रोड मैप स्वयं तैयार करती हैं। यहां कोई स्थायी भाव होना जरूरी नहीं। आवश्यक नहीं है कि कोई तथ्य हो, प्रमाण हो, किसी तरह की गारंटी हो, बस मन की उड़ान होती है। एक दिन, भोर के ठीक बाद, राजेश का फोन बजा। दूसरी तरफ निशा थी, यह कहते हुए — सुनो, तुम कभी हरिद्वार में रहे थे न! आज मैं यहां से गुजरी तो सोचा, कुछ जानकारी ले लूं। न, न.. कुछ भी चमत्कारिक नहीं हुआ था। वहां कोई जुड़ाव भी न था। राजेश को पता था, निशा नहीं आएगी कभी, पर वह खुशी से नहा गया। अव्वल, यहां कोई स्पष्ट आशा भी नहीं थी, पर भरोसा जागा — निशा की याद में उसका नाम बाकी है।
एक उदास शाम के साए में
शाम के घर पर जुगनुओं की बारात आ रुकी थी। मोहित के लिए सांसें लेना भी मुश्किल था। याद और रात की रिश्तेदारी शायद बहुत पुरानी है, उतनी ही, जितनी कि कायनात। आज उसे फिर रागिनी की याद आ रही थी। एस्प्रेसो कॉफी और उन दोनों का साथ, लेकिन अब रागिनी कहीं नहीं थी। दूर-दूर तक नहीं। एक वक्त था, जब उसके सेलफोन के मिस्ड, रिसीव्ड और डायल्ड कॉल रिकॉर्ड में रागिनी के नाम से ही सारी एंट्रीज पटी होती थीं और अब कहां, इनबॉक्स में आखिरी संदेश भी तीन साल पुराना..! ‘क्यों सोचता हूं मैं उसके बारे में इतना, इस शिद्दत के साथ’ — यह सोचा मोहित ने, फिर उसी याद में डूब गया। दिल के किसी कोने में शायद ज़िन्दगी की बाकी दुश्वारियां और जरूरतें थमी हों, पर बाकी पूरा का पूरा मन मुकम्मल याद है। ये हालत केवल मोहित की नहीं है। लोग उन्हीं यादों के साए में गुमशुदा रहते हैं, जिनका उनके आज से कोई ताल्लुक नहीं होता। यादें गुजरा कल हैं — यह बात जितनी जल्दी जेहन में दर्ज कर ली जाए, उतना ही अच्छा, लेकिन ‘बेखुदी में बस तुमको पुकारे चले गए’ नगमा जितना सुरीला है, उतना ही कड़वा सच है यह कि कुछ लोगों की ज़िन्दगी में आज और आने वाले कल के मायने बहुत कम हैं और गुजरे कल के सबसे ज्यादा। यह भी मन को समझाने की कोशिश ही है — कल वह फिर लौटेगा, जिसके साथ गुजारा हर लम्हा जन्नत से भी ज्यादा खूबसूरत और शहद से ज्यादा मीठा था!
सुंदर मुंदरिए हो.. दुल्ला भट्टी वाला हो
वैसे, उम्मीद प्रेमी प्रेमियों के खाते में दर्ज कोई सुनहरा भर नहीं है। आशा का रिश्ता कभी कभार समय और समाज के पार भी होता है। लोहड़ी के पर्व के साथ जुड़ा एक अफसाना दोहराते हैं। आपने सुना होगा, इस दिन स्त्रियां और बच्चे गुनगुनाते हैं — सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौण विचारा होए दुल्ला भट्टी वाला हो..। कौन है सुंदरी? दुल्ला भट्टी किसका नाम है? नहीं, नहीं, ये प्रेमी या प्रेमिका नहीं। एक बेटी है, दूसरा उसका धर्म पिता। बहुत पुरानी कहानी है। पंजाब के एक की कन्या सुंदरी के रूप गुणों की चर्चा गंजीबार के राजा ने सुनी और वह मुग्ध हो गया। उसने सुंदरी के पिता को संदेश भेजा — अपनी बेटी को हमारे रनिवास में भेज दो और बदले में जो चाहो, धन ले लो।
दुखी और भयभीत की मदद दुल्ला भट्टी ने की। उसने सुंदरी को अपनी बेटी माना और रात ओ रात उसकी शादी करा दी। नाराज राजा ने दुल्ला भट्टी के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, लेकिन दुल्ला को मिले नैतिक समर्थन और उसकी हिम्मत के आगे राजा पराजित हो गया। इस खुशी में लोगों ने अलाव जलाया, भंगड़ा किया और खुशी में जोर-जोर से नारे लगाए।
एक सवाल मन में उभरा होगा.. यहां कौन-सी आस की बात कही जा रही है? है न उम्मीद और वह भी एक समय की नहीं, बल्कि युग-युगांतर की, जन्मों-जन्मों की। एक ऐसी आशा, जिसे समय का पहिया भी धुंधला नहीं कर पाया। पूरा देश मनाता है इस उम्मीद का जश्न, लोहड़ी के दिन। हम सब सोचते हैं कहीं न कहीं मन में, जब जब किसी सुंदरी पर संकट आएगा तो कोई न कोई दुल्ला आगे आएगा।
यूं, बात थोड़ी काल्पनिक सी लगेगी, मन में यह ख्याल भी उभरेगा — यह दिवास्वप्न से ज्यादा क्या है, लेकिन इसका जवाब यही है — मन ख्वाबों की दुनिया में ही चहलकदमी करता है और उम्मीदें तर्क की धरती से अलग, एक इंद्रधनुषी कैनवास पर चाहत के चित्र बनाया करती हैं।
आशाओं के, स्वप्नों के इस संसार की पूरी बनावट उलझावों से भरपूर है। यहां गणित नहीं है, विज्ञान भी नहीं, बस भावना का ही हर तरफ विस्तार है। प्यार के, कई बार तुनकमिजाजी के, चंद लम्हो में थोड़े से दुराव और अलगाव के और फिर आकुल होकर एक दूसरे से मिल जाने की इच्छा के तार ही बनाते हैं कल्पना में यह संसार।
सपनों की दुनिया में इच्छाओं की रेलगाड़ी चलती ही जाती है, वह भी डीजल या इलेक्ट्रिक ट्रेन की मानिंद नहीं, छुक-छुक करती कोयले की रेलगाड़ी की तरह। स्वप्न जागते हैं, जलते-बुझते हैं, बिजली के लट्टुओं की मानिंद, ऐन जुगनुओं जैसे। तभी तो, आपके साथ हुआ होगा ऐसा — रातभर एक आवाज सुगबुगाहट की शक्ल में पीछा करती रही होगी। अंधेरे में शरमा, बादल आकाश की लाली में घुल गए होंगे। निगाह में बस पुलक होगी और होगी तार पर लटकी हुई एक चिंदी-चिंदी पतंग। पतंग उड़ नहीं सकती, आप जानते हैं, फिर भी तलाशने लग जाएंगे, मुंडेर के सहारे टिकाकर रखी मंझे की चरखी!