मनुस्मृति पर लगाये जाने वाले तीन मुख्य आक्षेप :

१. मनु ने जन्म के आधार पर जातिप्रथा का निर्माण किया |
२. मनु ने शूद्रों के लिए कठोर दंड का विधान किया और ऊँची जाति खासकर ब्राह्मणों के लिए विशेष प्रावधान रखे |
३. मनु नारी का विरोधी था और उनका तिरस्कार करता था | उसने स्त्रियों के लिए पुरुषों से कम अधिकार का विधान किया |
मनुस्मृति और जाति व्यवस्था :
मनुस्मृति उस काल की है जब जन्मना जाति व्यवस्था के विचार का भी कोई अस्तित्व नहीं था | अत: मनुस्मृति जन्मना समाज व्यवस्था का कहीं भी समर्थन नहीं करती | महर्षि मनु ने मनुष्य के गुण- कर्म – स्वभाव पर आधारित समाज व्यवस्था की रचना कर के वेदों में परमात्मा द्वारा दिए गए आदेश का ही पालन किया है (देखें – ऋग्वेद-१०.१०.११-१२, यजुर्वेद-३१.१०-११, अथर्ववेद-१९.६.५-६) |
यह वर्ण व्यवस्था है | वर्ण शब्द “वृञ” धातु से बनता है जिसका मतलब है चयन या चुनना और सामान्यत: प्रयुक्त शब्द वरण भी यही अर्थ रखता है | जैसे वर अर्थात् कन्या द्वारा चुना गया पति, जिससे पता चलता है कि वैदिक व्यवस्था कन्या को अपना पति चुनने का पूर्ण अधिकार देती है |
मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था को ही बताया गया है और जाति व्यवस्था को नहीं इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि मनुस्मृति के प्रथम अध्याय में कहीं भी जाति या गोत्र शब्द ही नहीं है बल्कि वहां चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है | यदि जाति या गोत्र का इतना ही महत्त्व होता तो मनु इसका उल्लेख अवश्य करते कि कौनसी जाति ब्राह्मणों से संबंधित है, कौनसी क्षत्रियों से, कौनसी वैश्यों और शूद्रों से |
इस का मतलब हुआ कि स्वयं को जन्म से ब्राह्मण या उच्च जाति का मानने वालों के पास इसका कोई प्रमाण नहीं है | ज्यादा से ज्यादा वे इतना बता सकते हैं कि कुछ पीढ़ियों पहले से उनके पूर्वज स्वयं को ऊँची जाति का कहलाते आए हैं | ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि सभ्यता के आरंभ से ही यह लोग ऊँची जाति के थे | जब वह यह साबित नहीं कर सकते तो उनको यह कहने का क्या अधिकार है कि आज जिन्हें जन्मना शूद्र माना जाता है, वह कुछ पीढ़ियों पहले ब्राह्मण नहीं थे ? और स्वयं जो अपने को ऊँची जाति का कहते हैं वे कुछ पीढ़ियों पहले शूद्र नहीं थे ?
मनुस्मृति ३.१०९ में साफ़ कहा है कि अपने गोत्र या कुल की दुहाई देकर भोजन करने वाले को स्वयं का उगलकर खाने वाला माना जाए | अतः मनुस्मृति के अनुसार जो जन्मना ब्राह्मण या ऊँची जाति वाले अपने गोत्र या वंश का हवाला देकर स्वयं को बड़ा कहते हैं और मान-सम्मान की अपेक्षा रखते हैं उन्हें तिरस्कृत किया जाना चाहिए |
मनुस्मृति २. १३६: धनी होना, बांधव होना, आयु में बड़े होना, श्रेष्ठ कर्म का होना और विद्वत्ता यह पाँच सम्मान के उत्तरोत्तर मानदंड हैं | इन में कहीं भी कुल, जाति, गोत्र या वंश को सम्मान का मानदंड नहीं माना गया है |

 

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दूसरी ओर जातीय घमंड में चूर और उच्चता में अकड़े हुए लोगों के लिए मनुस्मृति एक ऐसा धार्मिक ग्रंथ है जो उन्हें एक विशिष्ट वर्ग में नहीं जन्में लोगों के प्रति सही व्यवहार नहीं करने का अधिकार और अनुमति देता है| ऐसे लोग मनुस्मृति से कुछ एक गलत और भ्रष्ट श्लोकों का हवाला देकर जातिप्रथा को उचित बताते हैं पर स्वयं की अनुकूलता और स्वार्थ के लिए यह भूलते हैं कि वह जो कह रहे हैं उसे के बिलकुल विपरीत अनेक श्लोक हैं |
इन दोनों शक्तियों के बीच संघर्ष ने आज भारत में निचले स्तर की राजनीति को जन्म दिया है |भारतवर्ष पर लगातार पिछले हजार वर्षों से होते आ रहे आक्रमणों के लिए भी यही जिम्मेदार है| सदियों तक नरपिशाच,गोहत्यारे और पापियों से यह पावन धरती शासित रही| यह अतार्किक जातिप्रथा ही १९४७ में हमारे देश के बंटवारे का प्रमुख कारण रही है| कभी विश्वगुरु और चक्रवर्ती सम्राटों का यह देश था | आज भी हम में असीम क्षमता और बुद्धि धन है फ़िर भी हम समृद्धि और सामर्थ्य की ओर अपने देश को नहीं ले जा पाए और निर्बल और निराधार खड़े हैं – इस का प्रमुख कारण यह मलिन जाति प्रथा है| इसलिए मनुस्मृति की सही परिपेक्ष्य में जाँच – परख़ अत्यंत आवश्यक हो जाती है |

 

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मनुस्मृति जो सृष्टि में नीति और धर्म ( कानून) का निर्धारण करने वाला सबसे पहला ग्रंथ माना गया है उस को घोर जाति प्रथा को बढ़ावा देने वाला भी बताया जा रहा है |आज स्थिति यह है कि मनुस्मृति वैदिक संस्कृति की सबसे अधिक विवादित पुस्तकों में है | पूरा का पूरा दलित आन्दोलन ‘ मनुवाद ‘ के विरोध पर ही खड़ा हुआ है |
मनु जाति प्रथा के समर्थकों के नायक हैं तो दलित नेताओं ने उन्हें खलनायक के सांचे में ढाल रखा है | पिछड़े तबकों के प्रति प्यार का दिखावा कर स्वार्थ की रोटियां सेकने के लिए ही अग्निवेश और मायावती जैसे बहुत से लोगों द्वारा मनुस्मृति जलाई जाती रही है | अपनी विकृत भावनाओं को पूरा करने के लिए नीची जातियों पर अत्याचार करने वाले, एक सींग वाले विद्वान राक्षस के रूप में भी मनु को चित्रित किया गया है | हिन्दुत्व और वेदों को गालियां देने वाले कथित सुधारवादियों के लिए तो मनुस्मृति एक पसंदीदा साधन बन गया है| विधर्मी वायरस पीढ़ियों से हिन्दुओं के धर्मांतरण में इससे फ़ायदा उठाते आए हैं जो आज भी जारी है | ध्यान देने वाली बात यह है कि मनु की निंदा करने वाले इन लोगों ने मनुस्मृति को कभी गंभीरता से पढ़ा भी है कि नहीं |

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जिंदगी में भरो रंग ….

पहले जब होली आती थी
खूब मस्तियां होती थी
जमीन भी गीली
आसमान भी गीला
होता सारा जहां रंगीला
दिन चार पहले होली के
सजते थे बाजार रंगों के
बच्‍चे पिचकारी चुनते थे
फिर भर रंग गुब्‍बारे फैंकते थे
रूकने पर राहगीर के
घर में छिपते फिरते थे

आता जैसे दिन फाग का
होता आसमान रंगों का
ढोल नगाडे बजते थे
हुर्रारे नाचते फिरते थे
घर-घर जाकर
पुआ-पकौडे खाते थे
कहीं पर मिलती बूंटी भोले की
मस्‍त होकर पीते थे

अब होली कहां रही रंगों की

दुश्‍मन हो गए भाई-भाई
रह गई होली खून की
लगा दिया गर रंग किसी को
गाली सुनने को मिलती है
अब गले लगाने की जगह
बंदूक गले पड जाती है
होली मनाने की जगह
अब गोली चलाई जाती है

अब कहां गया वो दौर होली का
कहां खो गए रंग गुलाल
कहां से आ गई शराब बीच में
रंग में भंग डालने को
मत भूलो तुम हो भारतवंशी
दी थी होली श्रीकृष्‍ण ने
खेली थी वृंदावन में
कहो तुम उस देश के वासी हो

होली आई है होली मनाओ
रंग गुलाल सभी को लगाओ
सब को अपने गले लगाओ

 

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होली बृज में ….

बृजबाला और गुवाला नन्दलाल के लगे हैं संग,
गड्वन में रंग घोल गेरत वह गोरी रे |
मारत पिचकारी तान-तान के कुंवर कान्ह,
मची धूम धाम नची अहीरों की छोरी रे |
चंग पे धमाल गावे स्वर में स्वर मिला के सखी,
कहता शिवदीन धन्य, आज वही होरी रे |
झूम-झूम झूमे,श्यामा श्याम दोउ घूमें,
अनुपम रंग राचे कृष्ण नाचे यें किशोरी रे |


 

होरी का आनंद नन्द, नन्दलाल द्वार-द्वार,
रंग की पिचकारी व गुलाल लाल-लाल है |
रसिया के रसिक कृष्ण, गाय़़ रहे बंसी में,
सुन-सुन के दौड़-दौड़ आय गये गुवाल है |
गोपिन का झमेला, राधे पारत प्रेम हेला,
डारत रंग-रंग, गले प्रेम पुष्प माल है |
कहता शिवदीन लाल, राधे कृष्ण गुवाल बाल,
कर में गुलाल लाल, नांचत गोपाल है |


कृष्ण श्याम श्यामा संग, देखो सखी होली रंग,
गुवाल बाल चंग बजा नांचत नांच गोरी रे |
मारत पिचकारी अरे भर-भर के रंग लाल,
लाल ही गुलाल लाल, लाल युगल जोरी रे |
होरी के दीवाना को, पकर-पकर कान्हा को,
नांच यूँ नाचावें, नांचे अहीरों की छोरी रे |
कहता शिवदीन राम आनन्द अपार आज,
आज वह तिंवार* सखी, सजो साज होरी रे |

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बृज में होली का त्यौहार …….

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राधा कृष्ण हिन्दी कविता के सबसे अधिक शृंगारिक नायक और नायिका हैं। उनकी क्रीडास्थली बृज भूमि, उनकी रासलीलाओं, क्रियाकलापों और खेल की उछल-कूदों को आज भी याद करतीं है। आज भी उस धरती के निवासी कभी-कभी विशेष अवसरों पर उन क्रियाकलापों को साकार कर देते हैं।

होली का त्यौहार बृजक्षेत्र का सर्वाधिक रगीन उत्सव है, जबकि वहाँ होली से कई दिन पूर्व गली-गली और मोहल्लों में होली के रास रचाये जाते हैं, फाग और स्वांग खेले जाते हैं। आज यद्यपि इस क्षेत्र में स्वांग की सीमाएँ उतनी घनघोर नहीं रह गई हैं, फिर भी वहाँ के गाँव में स्वागों की वही भावभीनी रसधारा प्रवाहित हो रही है। जगह-जगह मंचों पर स्कूलों और कॉलेजों के प्रांगणों में राधा कृष्ण के अभिनय से वहाँ का सांस्कृतिक जीवन आज भी परिपूर्ण हैं।

फागुन मस्ती का महीना है। फली-फूली प्रकृति के साथ ही नर-नारियों के हृदय में भी मस्ती और उमंगें अठखेलियाँ करती हैं। राधा और कृष्ण की इस कार्य स्थली भूमि पर हर हृदय में नया जोश और नया उत्साह भर जाता है। युवक ही नहीं वरिष्ठ नागरिक भी होली के अवसर पर अपनी उमंगों को प्रकट करने के लिए अत्यंत उतावले हो उठते हैं। जी हाँ, और तो और यदि अपनी कोई उनकी सगी भाभी और साली नहीं होती हैं तो कोसों दूर पड़ोस के गाँव में वे किसी को भी अपनी भाभी बनाकर होली खेलने की तमन्ना पूरी करते हैं। संभवत: ऐसे वरिष्ठ हृदय की यौवन भरी मनोभावनाओं को व्यक्त करने के लिए ही बृजभाषा की ये कहावतें आज भी प्रचलित हैं – “फागुन में बाबा देवर लागे” अथवा “फागुन में जेठ कहे भाभी”।

इन्हीं रसभरी कहावतों में छिपी पड़ी हैं राधा और कृष्ण की होली की उमंग, होली की अठखेलियाँ जो होली के त्यौहार से रस लेकर उन वरिष्ठ हृदयों को भी रसिया बना देती है – ये ‘रसिया’ परंपरा बृज में होली के पर्व की आत्मा ही बन गई हैं, जो जनमानस में व्याप्त हो गई हैं। तभी तो बृज क्षेत्र में होली के अवसर पर गाँव-गाँव की गलियों में एक समवेत स्वर गूँजता है – “आज बिरज में होरी हे रसिया” इस रसिया को झांझ और ढोलक को ध्वनि में लय मिलती है और आबाल, वृद्ध, नर-नारी अपना स्वर देते हैं।

शोभा यात्राओं में अनेक नवयुवक और नवयुवतियाँ राधा कृष्ण का अभिनय करते चलते हैं- राधा कृष्ण के वेश और परिधान में सुशोभित। कहीं गुलाल उडाते जाते हुए, कहीं बाँसुरी बजाते और कहीं अठखेलियाँ करते कृष्ण का अभिनय लाज से शर्माती राधा के साथ देखते ही बनता है। राधा कृष्ण का हाथ पकड़ कर रंग न डालने का अनुग्रह करती हैं – “कान्हा तुम मत मारो पिचकारी” पिचकारी के रंग से राधा और उसकी सखियाँ भीग जाएँगी। रंग से उनके कपड़े बदरंग हो जाएँगे और शरीर पर चिपकने पर तंग हो जाएँगे।

अरे भर पिचकारी मारी,
मेरी चोली सुरख बिगारी,
और अंखियन में भरौ गुलाल,
मैं कैसे होरी खेलूँगी,
या साँवरिया के संग।
याने रंग यों मो पे मारो,
तो मेरी चुनरी जाएगी रंग,
मेरी चोली होगी तंग,
रंग में कैसे होरी खेलूँगी,
या साँवरिया के संग

चाहे यह सब बातें राधा को डराती रहें, परंतु होली के रंग भरे, त्यौहार की मस्ती में राधा भी सराबोर हो जाना चाहती है – वह चाहती हैं कि कृष्ण स्वयं उसके घर पर आएँ और उनसे होली खेलें। अत: खुद ही कृष्ण को न्यौता भी दे गईं – “कान्हा बरसाने में आ जाइयो, बुलाय गई राधा प्यारी।” इन्हीं लोकगीतों की भावनाएं मुखरित होती हैं, बृज के स्वांगों में।

ग्वाल-बाल सहित कृष्ण का जमघट और ग्वालिन सहेलियों (अहीर की छोरियाँ) के साथ राधा के पारी संवाद होते हैं : आँखों के इशारे चलते हैं और इस सब अभिनय के साथ हाथों में गुलाल ले कर अहीर की छोकरियाँ कृष्ण और उनके साथियों को पकड़ कर गुलाल मल देती हैं। उनके चेहरों पर बिखरते गुलाल और प्रत्युत्तर में कृष्ण की पिचकारी की रंगीन धाराओं के प्रहार को देख हजारों दर्शक भी स्वांग में गा उठते हैं –
“होरी खेल रहे नंदलाल, बिरजन की कुंज गली में, मथुरन की कुंज गली में।”            -महेश कटरपंच

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:- बृज में हरि होली मचाई -:

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होली मौज का त्योहार है, मिलन का त्योहार है, दु:ख भूल जाने का त्योहार है। लोग भंग छानते हैं, एक-दूसरे पर प्रेम से अबीर उड़ाते हैं, गुलाल मलते हैं, रंग डालते हैं और पुरानी शत्रुता को भूल जाते हैं। ढोल-मनीरा-झाँझ बजाते हैं और होली गाते हैं। निम्न फाग में रसिकता फूट पड़ती है।

ब्रजचंद साँवलिया गोपियों के साथ जी भर होली खेल रहे हैं –
मथुरा में साँवरिया खेले होरी, अरे खेले होरी, भरे झोरी।
अरी इतते आई सबही ग्वालिन, उतते साँवरिया केसर घोरी।
अरे पिचकारी सबई पे मारी, अरे कोई गोरी, कोई है भोरी।
नंद बाबा ने रंग घुरवाए, अरे कुंड एक मन केसर छोरी।।

एक अन्य गीत में गोपियों ने कृष्ण की खूब खबर ली है। कृष्ण गोपियों को किसी-न-किसी बहाने तंग किया करते थे। एक दिन गोपियों ने मिलकर एक योजना बना डाली और कृष्ण को पकड़, उनका स्त्री वेश बनाकर खूब खिल्ली उड़ाई –

छीन लई वनमाल मुरलिया, सिर मैं चुनरि उढ़ाई।
बेंदी भाल नैन बिच काजर, नथ बेसरि पहराई।
लला नई नारि बनाई, ब्रज में हरि होरी मचाई।।

होली गाते समय शृंगार की नन्हीं फुहारें नीरस हृदय में भी सरसता का संचार करती हैं। एक गोपिका कृष्ण से होली खेलने की मनाही नहीं करती, परंतु वे ज़रा बचाकर रंग डालें, बस यह ध्यान रखें –

साँवरिया रंग डारो बचाई, फुँदना बिगरैं न चोली के
फुँदना बिगरैं बिगरि जान दें, जोबना देउ बचाय।
जोबना बिगरै बिगरि जान दें, चोली देउ बचाय।
फुँदना न बिगरैं चोली के।।

चाहे संपूर्ण अंग-प्रत्यंग रंग से सराबोर हो जाए, चिंता नहीं, पर यौवन और उनकी संरक्षिका कंचुकी को पति की अमानत के रूप में अक्षत रखना चाहती हैं। गीत में बड़ी गहन प्रेम-व्यंजना परिलक्षित होती हैं। गोपियों से छेड़छाड़ करने में कृष्ण को बड़ा मज़ा आता है। गोपियाँ पिटवाने की धमकी देती हैं। पर कृष्ण तनिक बाज़ नहीं आते –

फटि जैहैं चुनरिया जिन तानो, हमरी बात मोहन मानो।
जो सुन पावै कंस और राजा, अरे बरसाने में है धानो।
एक बार तुम गम खाओ मोहन, अरे पैरें सुनहरी हम गहनो।
मुसकँ बाँध तुमको पैड दें, जसुदाजी को है जैसे बहानो।।

फागुन के मस्त महीने में होली खेलने में लज्जा-शर्म का त्याग बुरा नहीं –

मनमानी छैल करो होरी, सब लाज शरम डारों तोरी।
महिना मस्त लगें फागुन को, अब न कोउ दैहें खोरी।
अब डर नाहिं पुरा पालै को, लड़ै न सास ननद मोरी।।

एक नायिका नायक से रंग न डालने का अनुनय करती है। उसे भय है कि रंग में डूबी घर पहुँचने पर घर के लोग उसका बहिष्कार कर देंगे, क्यों कि पर पुरुष के साथ होली खेलने से पारिवारिक मर्यादा का उल्लंघन होता है –

मो पै रंग न डारौ साँवरिया, मैं तो ऊसई अतर में डूभी लला।
जो सुनि पाएँ ससुरा हमारे, आउन न दैहें बखरिया लला।
जो सुनि पाए जेठा हमारे, छियन न दैहें रसइया लला।
जो सुनि पाएँ सइयाँ हमारे, आउन न दैहें सेजरिया लला।।

प्राचीन काल में राजघरानों में सोने की पिचकारी में केसर का रंग भरकर होली खेली जाती थी। आनंदाधिक्य में लोग दस मन केसर घोलकर रंग बनाते हैं और गुलाल इतना अधिक उड़ाते हैं कि संपूर्ण नभमंडल रक्तवर्ण हो जाता है –

उड़त गुलाल लाल भए बादर,
कै मन प्यारे रंग बनाए कै मन केसरि घोरी।
नौ मन प्यारे रंग बनाए दस मन केसरि घोरी।
काहे की रे रंग बनाए, काहे की पिचकारी,
केसर की रे रंग बनाए, सोने की पिचकारी।
भरि पिचकारी सन्मुख मारी, भीजि गई सब सारी।।

‘उड़त गुलाल लाल भए बादर’ में अतिशयोक्ति अलंकार निखर पड़ा है। बुंदेलखंड की रसीली होली की मादकता में राम और लक्ष्मण भी प्रसन्न हो उठे हैं –

राजा बलि के द्वारे मची होरी।
कौन के हाथ ढोलकिया सोहे, कौन के हाथ मजीरा,
राम के हाथ ढोलकिया सोहे, लछमन के हाथ मजीरा।
कौन के हाथ रंग की गगरिया, कौन के हाथ अबीर झोली,
राम के हाथ रंग की गगरिया, लछमन के हाथ अबीर झोली।
राजा बलि के द्वारे मची होली।।
यहाँ राम और लक्ष्मण को सामान्य जन की तरह चित्रित कर लोकभाव की प्रतिष्ठा की गई है।

(साहित्य अमृत” से साभार)

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दोस्ती : एक पवित्र रिश्ता …..

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वर्तमान परिप्रेक्ष्य में रिश्तों के मायने पूरी तरह से बदल गए हैं। आज भाई भाई का व दोस्त दोस्त का दुश्मन बना बैठा है। पश्चिम के अंधानुकरण के कारण युवाओं में आज दोस्ती लफ्ज केवल ‘प्यार’ शब्द तक ही सीमित रह गया है।
वास्तविकता में दोस्ती प्यार से बढ़कर बहुत कुछ होती है। हमेशा स्त्री-पुरूष की दोस्ती ‘प्यार’ ही हो, यह आवश्यक नहीं। वह प्यार से भी बढ़कर एक पवित्र रिश्ता होता है।

यूँ तो हर कोई हमें अपना दोस्त कहता है, पर सच्चे दोस्त केवल खुशनसीब लोगों को ही नसीब होते हैं। आज भी हमारे आसपास कुछ लोग ऐसे हैं, जो दोस्ती की मिसाल बने हैं। उनकी दोस्ती के फसाने दुनिया दोहराती है। दूरियाँ भी उन्हें जुदा नहीं कर पातीं।

दोस्ती जिंदादिली का नाम है। यह एक ऐसा रिश्ता है जिसे दिल से जिया जाता है। इसमें औपचारिकता, अहंकार व प्रदर्शन नहीं बल्कि सामंजस्य व आपसी समझ काम आती है।

जीने का ढंग तूने सिखलाया,
तू है मेरा हमराज़, हमसाया।
तूने पढ़ लिए सारे राज़,
मैं बनी एक खुली किताब।

हमारी जिंदगी में बहुत से ऐसे राज होते हैं जिन्हें हम हर किसी को नहीं बता सकते। ऐसे में हम उन्हें अपने दोस्तों को बताते हैं। एक खुली किताब की तरह हम अपनी जिंदगी के सभी पन्ने उसके सामने खोल देते हैं और वह भी एक मार्गदर्शक बन हमें भटकाव से सही राह की ओर ले जाता है।

सामंजस्य, समर्पण, समझ और सहनशीलता एक अच्छे दोस्त की पहचान होती है। दोस्ती में कोई अमीरी-गरीबी या ऊँच-नीच नहीं होती। इसमें केवल भावनाएँ होती हैं, जो दो अनजान लोगों को जोड़ती हैं।

कई बार परेशानियों के समय हमारा अपना पीछे हट जाता है तब दोस्त ही होता है जो हमें हिम्मत देकर हमारा साथ निभाता है। ऐसे ही वक्त में हमें अपने-पराए की पहचान होती है।

आपका सच्चा दोस्त आपकी जिंदगी बदल सकता है। वह आपको बुराइयों के कीचड़ से निकालकर अच्छाइयों की ओर ले जाता है। हमेशा आपकी झूठी तारीफ करने वाला और चापलूसी करने वाला आपका सच्चा दोस्त नहीं है।

सच्चा दोस्त वही है जो आपकी गलतियों पर पर्दा डालने के बजाय निष्पक्ष रूप से अपना पक्ष प्रस्तुत करे। आपको आपकी बुराइयों से अवगत कराए। उसके कुछ कड़वे वचन यदि आपकी जिंदगी को बदल दें तो समझिए कि वही आपका सच्चा दोस्त है फिर उस दोस्त को कभी मत छोडि़एगा।

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समय की गणना और पाश्चात्य केलैण्डर …

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आधुनिक वैज्ञानिक अब कहते हैं कि हमारी सृष्टि में अनगिनत ग्रह प्रति दिन पैदा हो रहे है और कई ग्रह अपना समय पूरा कर के विलीन हो रहै हैं – लेकिन हिन्दूग्रंथ तो आधुनिक वैज्ञानिकों से हजारों वर्षों पहले से ही कहते आ रहै हैं कि सृष्टि अनादि है – उस का कोई आरम्भ नहीं, सष्टि अनन्त है – उस का कोई अन्त भी नहीं। भारत के अंग्रेजी-प्रेमी शायद आज भी नहीं जानते कि केवल हिन्दू शास्त्रों के समय सम्बन्धी आँकडे ही आधुनिक वैज्ञानिक खगोल शास्त्रियों के आँकडों से मेल खाते हैं।

समय की गणना

आधुनिक वैज्ञानिक यह भी मानने लगे हैं कि सृष्टि के कालचक्र में ब्रह्मा का (यूनिवर्स) ऐक दिवस और रात्रि, पृथ्वी के एक दिवस और रात्रि के समय से 8.64 कोटि वर्षों बडी होती है। मनु स्मृति के प्रथम अध्याय में इस धरती के समय का विस्तरित उल्लेख किया गया है। आँख झपकने में जो समय लगता है उसे ऐक निमिष कहा गया है। निमिष के आधार पर समय तालिका इस प्रकार हैः-

18 निमिष = ऐक कास्था
30 कास्था = 1 कला
30 कला = 1 महू्र्त
30 महूर्त = अहोरात्र
30 अहोरात्र = 1 मास
ऐक अहोरात्र को सूर्य कार्य करने के लिये दिन, तथा विश्राम करने के लिये रात्रि में विभाजित करता है। प्रत्येक मास के दो ‘पक्ष’ होते हैं जिन्हें ‘शुकल-पक्ष’ और ‘कृष्ण-पक्ष’ कहते हैं। पँद्रह दिन के शुकल पक्ष में चाँदनी रातें होती हैं तथा उतनी ही अवधि के कृष्ण पक्ष में अन्धेरी रातें होती हैं। सभी माप दण्डों का सरल आधार ‘30’ की संख्या है। यह समय विभाजन प्रत्यक्ष, वैज्ञानिक, और प्रकृति के अनुकूल है।

दिन का आरम्भ सूर्योदय के साथ होता है जब सभी जीव अपने आप जाग जाते है। नदियों के जल में स्वच्छता और प्रवाह होता है, कमल खिलते है, ताज़ा हवा चल रही होती है तथा प्रकृति सभी को नये, शुद्ध वातावरण का आभास दे देती है। उसी प्रकार जब सूर्यास्त के साथ रात होती है, पशु पक्षी अपने आवास की ओर अपने आप लौट पडते हैं, नदियों का जल धीमी गति से बहने लगता है, फूल मुर्झा जाते है तथा प्रकृति सभी गति विधियां स्थागित करने का संकेत दे देती है। इन प्रत्यक्ष तथ्यों की तुलना में रोमन कैलेण्डर के अनुसार चाहे दिन हो या रात, 12 बजे जब तिथि बदलती है तो प्रकृति में कोई फेर बदल प्रत्यक्ष नहीं होता। सभी कुछ बनावटी और बासी होता है।

पाश्चात्य केलैण्डर

रोमन कैलेण्डर को जूलियस सीज़र ने रोम विजय के पश्चात ग्रैगेरियन कैलेण्डर के नाम से लागू करवाया था। इस कैलेण्डर का आज भी कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

वैसे तो ईसाई ऐक ईश्वर को मानने का दावा करते हैं और अधिक देवी देवताओं में विशवास करने के लिये हिन्दूओं का उपहास उडाते हैं। किन्तु उन के पास कोई जवाब नहीं कि उन्हों ने अपने दिनों तथा महीनों को देवी देवताओं के नामों से क्यों जोडा हुआ हैं। उन के सप्ताह में सन गाड का दिन – ‘सन-डे’’ मून गाडेस का दिन – ‘मन-डे’, ट्यूज देवता का दिन – ‘ट्यूजडे’, वुडन देवता का दिन – ‘वेडनेस-डे’, थोर देवता का दिन – ‘थर्स-डे’, फ्रिग्गा गाडेस का दिन – ‘फ्राई-डे’, तथा सैटर्न देवता का दिन – ‘सैटर-डे’ होता है। वास्तव में सप्ताह के दिनों के नाम भी रोमन वासियों नें भारत से ही चुराये हैं क्यों कि हमारे पूर्वजों ने दिनों के नाम सौर मण्डल के ग्रहों पर रखे गये थे जैसे कि रविवार (सूर्य), सोमवार (चन्द्र), मंगलवार (मंगल), बुद्धवार (बुद्ध), बृहस्पतिवार (बृहस्पति), शुक्रवार (शुक्र), और शनिवार (शनि)। क्योंकि बडी वस्तु को ‘गुरु’ कहा जाता है और छोटी को ‘लधु ’ – इसलिये बृहस्पतिवार को गुरुवार भी कहा जाता है। हमारे पूर्वजों को आधुनिक वैज्ञानिकों से बहुत पहले ही ज्ञात था कि बृहस्पति सौर मण्डल का सब से बडा ग्रह है।

पोर्तगीज भाषा में कैलैण्डर शब्द को ‘कालन्दर’ बोलते हैं जो संस्कृत के शब्द ‘कालन्तर’ (काल+अन्तर) का अपभृंश है। संस्कृत में कालन्तर उसी श्रेणी का शब्द है जैसे युगान्तर, मनवन्तर, कल्पान्तर आदि हैं। इन मापदण्डों का प्रयोग सौर मण्डल की काल गणना के लिये किया जाता है। रोमन कैलैण्डर के महीने सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर का स्त्रोत्र भी संस्कृत के क्रमशः सप्तमबर (सप्त+अम्बर), अष्टाम्बर, नवम्बर, तथा दशम्बर से है जिनका शब्दिक अर्थ सातवें, आठवें, नवमें और दसवें अम्बर (आसमान) से है।

अंग्रेजों का अपना कोई कैलैण्डर नहीं था और वह जूलियन कैलैण्डर को इस्तेमाल करते थे जिस में या साल ‘मार्च’ के महीने से शुरु होता था। साल में केवल दस महीने ही होते थे। मार्च से गिनें तो सेप्टेम्बर, ओक्टोबर, नवेम्बर और डिसेम्बर सातवें, आठवें, नौवें तथा दसवें महीने ही बनते हैं। जैसे जैसे अंग्रेजों में वैज्ञानिक जागृति आई तो उन्हों ने 1750 में ग्रीगेरियन कैलैण्डर (रोमन कैलैण्डर) को सरकारी कैलैण्डर बनाया और समय गणना को नयी सीख अनुसार पूरा करने के लिये दो महीने ‘जनवरी’ और ‘फरवरी’ भी जोड दिये। परम्परागत जनवरी 31 दिन का था और फरवरी में कभी 28 और कभी 29 दिन होते थे जिस का वैज्ञानिक आधार कुछ नहीं था। पश्चात ब्रिटिश संसद ने अपना वर्ष को मार्च के बदले जनवरी 1772 से प्रारम्भ करना शुरू किया क्यों कि क्रिस्मस के बाद पहला महीना जनवरी आता था।

हर रिश्ता कुछ कहता है !!

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जिंदगी की जिंदादिल महफिल में आप सबका स्वागत। यह पंक्ति पढ़कर यकायक लगेगा कि हम कोई रेडियो प्रोग्राम तो नहीं सुन रहे। अब इसका जवाब यह है कि नहीं, आप लेख ही पढ़ रहे हैं, लेकिन यहां बात जिंदगी की हो रही है तो स्वागत की रस्म अदायगी जरूरी है और रस्म भी महज निभाने के लिए नहीं, बल्कि जिंदगी को महसूस करने के लिए है। जिंदगी को भरपूर जीना जरूरी है, नहीं तो यह महफिल वीरान रह जाएगी।

उत्साह से खाली हुई जिंदगी एकदम खाली बर्तन की तरह है, यह तो आप मानते ही होंगे। चलिए, एक बार फिर जीवन का अर्थ तलाशने की कोशिश में जुट जाते हैं और दोहराते हैं वही सनातन मंत्र — जिंदगी उसी की है, जो किसी का हो लिया। किसी का होने का मतलब साफ है — दूजे के होंठों पर खुशी के गीत पिरोने का यत्न। ऐसी कोशिश, जिसका अंजाम किसी के लिए भी मुस्कुराहटों की फसल उगाना।

अच्छा, एक प्रश्न का उत्तर दीजिए जरा — इस फानी जिंदगी के बीच सबसे ज्यादा अक्षुण्ण, न मिटने वाला क्या रह जाता है। जवाब है — अच्छे कर्मो की, सुंदर व्यवहार की याद। हम सब संसार में एक-दूसरे के साथ किसी न किसी संबंध में बंधे हैं। कभी गौर करिए तो पाएंगे कि अखिल ब्रम्हांड, असंख्य आकाशगंगाओं और उनमें पलता जीवन, यहां तक कि जड़ वस्तुएं तक अन्योन्याश्रित हैं, पारस्परिक संबद्ध हैं। झरना पहाड़ से जुड़ा है, नदी झरने से। नदी बह चली तो समंदर से मिली।

समंदर का रिश्ता नदी से हुआ और जब भाप बनकर यही पानी उड़ा तो बादल बन गया। बारिश हुई और धरती का सीना लहलहा उठा। फसलें खिलीं और इंसान की भूख मिटी। देखिए, सब एक-दूसरे का हाथ किस कदर शिद्दत के साथ थामे हुए हैं। एक-दूसरे को अपना सब कुछ सौंपते हुए, फिर भी कोई एहसान नहीं जताते, अपनी कृपाओं की, साथ की, मोहम्बत की कोई डींग नहीं हांकते। महज इंसान ही बदल गया। उसने सबसे सब लिया और बदले में अपनी ओर से कुछ देने में हर पल कंजूसी बरती। कोई रिश्ता एकतरफा कहां होता है, नतीजा — कुदरत नाराज हुई। अक्सर होती रही है। कभी भू-स्खलन के रूप में, किसी पल बाढ़ और भूकंप की शक्ल में अपना गुस्सा दिखाती रही है, लेकिन इंसान यह नाराजगी समझना ही नहीं चाहता। वक्त आ गया है कि प्रकृति और पुरुष, यानी इंसान के संबंधों की गर्माहट को समझा जाए।

चलिए, कुदरत से अलग, दुनियाबी रिश्तों की बात करते हैं। कोई परिवार कैसे बनता है? आप कहेंगे, यह कौन-सा सवाल हुआ? हम सब जानते हैं कि संबंधों से ही परिवार की बुनावट होती है। माता-पिता, उनके बच्चे। बाकी बुजुर्ग और रिश्तेदार। यही सब मिलकर परिवार की शक्ल करते हैं, लेकिन रिश्ते-नातों की यह पेंटिंग जिस कैनवास पर रची जाती है, वह है — घर। हम कई बार इसे ही भुला देते हैं। यूं भी, हर रिश्ता कुछ कहता है, कुछ चाहता है। न.. नए कोई उपहार नहीं, आदर जैसी चीज भी नहीं, लेकिन प्यार के बदले प्यार की चाहत तो सबकी होती है।

सारी दुनिया में भारतीय परिवारों की सराहना होती है। कुछ तथाकथित पढ़े-लिखे लोग उपहास भी उड़ाते हैं कि हिंदुस्तानी पत्नी को अयोग्य पति भी मिल जाए तो वह उसका जिंदगी भर साथ देती है, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। सच तो यह है कि भारतीय परिवारों की जमीन में स्नेह और संस्कार का जो बीज मिला है, उससे विश्वास का वृक्ष तैयार होना स्वाभाविक है। पति-पत्नी गृहस्थी की गाड़ी चलाते हैं तो भाई-बहन एक-दूसरे के व्यक्तित्व की नींव मजबूत बनाते हैं।

दादा-दादी से संस्कार मिलते हैं, वहीं नाना-नानी, मौसा-मौसी, मामा-मामी, बुआ-फूफा, चाचा-चाची जैसे रिश्तों से अगाध स्नेह की मीठी-मीठी बारिश होती है। हर रिश्ते में कभी थोड़ी दूरी आती है तो कई बार लगता है — ये रिश्ते न होते तो जिंदगी में भला होता भी क्या! आइए, हम इन संबंधों की ऊष्मा को समझें। रिश्तों को महज ढोने, संभाले रखने, उनके साथ घिसटने की स्थितियों से बाहर निकलें। ये नाते मोहम्बत के तार हैं। इन्हें और मजबूत बनाएं। वक्त आ गया है कि हम रिश्तों की बोली को समझें और एक मुस्कान के बदले ढेर सारी हंसी देने को तैयार हो जाएं। लीजिए, मैं मुस्कुरा रहा हूं, अब आप अपनी हंसी की पोटली खाली कीजिए न झट से!

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अनजानी आस के पीछे………

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हर बार सन्नाटे भरे अंधेरे में, जब लगता — अब दिल डूब ही जाएगा, ऐन तभी मुस्कुराती दिखीं वे आंखें। दर्द से फटते माथे पर फिरती रहीं मखमली अंगुलियां। गुनगुनाती थी एक मीठी आवाज और उतर जाती थी नस-नस में। खुशी में, पीठ पर धौल जमाती हुई, हर सफर में साथ चलती हुई वह.. क्या था उसका नाम? वह कौन थी? वह छुअन क्या सच में वैसी ही होगी? वे आंखें उतनी ही जादुई होंगी, असल में भी? कैसा था एक अनजान साथ? कितनी दूर, नींद में संग-संग चलते रहे, किसी मोड़ पर अलग हो गए जो! क्या वह एक सुहाना भरम भर था या कहीं-कोई सच्चाई थी?

सपनों जैसा यह नजारा आखिर है क्या? महज एक घायल । उभरता है, उसके होने का एहसास, जो दरअसल, कहीं है ही नहीं। लड़के तलाशते हैं सपनों में ड्रीमगर्ल और लड़कियों की सोच में दाखिल होता है, सफेद घोड़े पर बैठा एक राजकुमार।

खुली आंख में जागता एक सपना

आज में, गुजरे कल के पन्नों पर — हर जगह अनजानी आस के पीछे हमारा भागना-दौड़ना बना है। कहीं, किसी रोज, किसी मोड़ से गुजरते हुए, कभी कोई आवाज नाम लेकर पुकारती है। हम ठिठकते हैं, मुड़ते हैं और ठहरते हैं, उस आवाज का चेहरा तलाश लेने के लिए, तभी पाते हैं कि वहां कोई नहीं है! एक, केवल भावनाओं में है। उसका कोई जिस्म नहीं। दरअसल, कोई आवाज भी नहीं। सिर्फ, एक सोच है, जो घेरे हुए है।
हम प्रेम में होते हैं, तब कहते हैं — ‘हां! तुम वही हो, जिसे मैंने वाबों में देखा था’, लेकिन यह बात सच्ची नहीं होती। प्रेम में ज्यादातर बार एक इंसान अपने साथी पर इच्छाओं का चेहरा थोप रहा होता है। यह भी एक रिश्ता है — कल्पना और कामनाओं का, ज़िन्दगी में आने वाले बाकी लोगों से बना अनूठा रिश्ता। यह रिश्ता स्वीकार्य नहीं होता। कुछ लोग ऐसे संबंध यह कहकर तोड़ देते हैं कि तुमने अपनी कल्पना मेरे अस्तित्व पर थोप दी है, पर ऐसी कोशिशें फिर भी होती हैं बार-बार। आखिर, कोई अपनी कल्पनाओं को एकदम नकार भी नहीं सकता न!

यह कोई नई बात भी नहीं है। बहुत पहले सुनी थी कुछ कहानियां। किसी ने एक सुंदर स्त्री की तारीफ सुनी। उसके रूप की, रंग की, स्वभाव की बातें जानीं और यूं ही मिले बिना, बस बैठे-बैठे दिल दे बैठा। ऐसा होना मुमकिन नहीं लगेगा, पर इतिहास के पन्ने, कहानियों के सफे बताते हैं — दिल के लेन-देन का कारोबार जिस्म के होने से ताल्लुक नहीं रखता। कुछ लोग कहेंगे — यह मृगमरीचिका के सिवा कुछ नहीं, पर क्या करें, दिल ही तो है, सो बहुत से इंसानों के लिए उनकी कल्पनाएं बड़ी हैं, सच्ची हैं और सुंदर भी हैं।

मलिक मोहम्मद जायसी ने मसनवी शैली में एक प्रबंध काव्य रचा है — पद्मावत। 57 खंडों में एक प्रेम कहानी है। पद्मावती और रत्नसेन की प्रेमकथा। पद्मावती के घर में एक सुग्गा (तोता) हीरामन पला था। बचपन से ही दोनों एक-दूसरे के साथी बन गए। पद्मावती बड़ी हुई। एक बार, कुछ ऐसा घटा कि वही सुग्गा किसी तरीके से पहुंच गया। के राजा ‘रत्नसेन’ ने उसे अपने पास रख लिया।

एक दिन रत्नसेन शिकार के लिए गया। तोते ने उसकी रानी नागमती को बता दिया कि दुनिया में सबसे ज्यादा सुंदर पद्मावती ही है। अब उसकी जान पर बन आई। किसी तरह प्राण बचे तो सुग्गे ने राजा को भी पद्मावती के रूप के बारे में विस्तार से बताया। कितना ही समय बीत गया, लेकिन सुग्गा थका नहीं। वह पद्मावती के बारे में बोलता रहा। वह कहता गया और रत्नसेन सुनते रहे। वह इस बयान से इतना मुग्ध हुआ कि सारा राज पाट छोड़कर पद्मावती की तलाश में जोगी बनकर महल से निकल पड़ा। कहानी जानी पहचानी है, लेकिन क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया — यहां भी एक खिंचाव था, एक तलाश थी, एक यात्रा थी। किसी अनजानी चाह से वशीभूत होकर राजा ने वैभव त्यागा, अपनी सांसारिकता छोड़ी और प्रेम की खोज में दर-ब-दर भटकने लगा।

हर मोहब्बत का अंजाम जुदाई क्यों है?

सैंणी और बीझा की मशहूर कहानी सुनी है आपने? कहां के हैं दोनों, यह छोड़िए, बस कहानी याद कीजिए। पनघट पर पानी भरते हुए सैंणी से बीझा ने पानी पीने के लिए मांगा और उसने दिल तोड़ने वाले अंदाज में मना कर दिया — ‘न, न, तुम्हारे लिए पानी नहीं!’ इस पर भी जुल्म यह कि एक कौए को पानी पीने दिया। बीझा कलश छू लेता तो वह अपवित्र हो जाता, पर कौए से कोई दुराव नहीं! बाद में वही सैंणी बीझा के इंतजार में अपनी देह पहाड़ों में गला बैठी। उनके मिलने का कोई संयोग नहीं था। ईश्वर ने कोई दिन ऐसा रचा ही नहीं था, जब उनका मिलना नियति के पन्नों पर लिखा जा सकता, लेकिन एक प्रतीक्षा थी, वही अपरिभाषित उम्मीद , जिसके लिए सैंणी सांस रोके बीझा के इंतजार में बैठी रही। बाद में वे मिले, लेकिन सैंणी की जान जाती रही। रेगिस्तान में पानी तलाशता है यह मन। पतझड़ में वसंत के आने की आहट सुनता है। बंजर धरती पर फूलों की खेती करने को अकुलाता है। यही अकुलाहट, ऐसी ही प्रतीक्षा और इसी किस्म का उद्वेलन उन उम्मीदों को जन्म देता है, वैसी तसवीरें रचता है, जिनका कोई आधार नहीं, जिनकी कोई नियति नहीं।

मूमल महेंद्र का अफसाना भी सुन लीजिए। अमरकोट के राणा वीसलदे का बेटा था महेंद्र। एक दिन शिकार करते हुए काक नदी के किनारे पहुंच गया। झोपड़ी से मूमल ने उसे देखा। उसने दास दासियों से कहा — उस, खूबसूरत नौजवान का आतिथ्य करो। चलते वक्त महेंद्र ने एक युवती से पूछा — हम किसके मेहमान हैं? युवती मूमल की सहेली थी। उसने मूमल के रूप गुणों स्वभाव की तारीफ में शब्दों की नदी बहा दी। वहां पहुंचे नाई ने तो यहां तक कह दिया — मूमल शीशे में खुद को देखती है तो शीशा चटक जाता है। चांद शरमा जाता है। भगवान ने उस जैसी कोई लड़की नहीं बनाई। यह सुनकर महेंद्र दिल हार बैठा। इसके बाद की कथा सब जानते हैं, वह ये कि बड़ी जद्दोजहद के बाद दोनों मिले। इस कहानी का अंत भी दुखांत हुआ.. शक के जहर ने उनकी मोहबत की सांसें छीन लीं.. लेकिन मूमल अंतिम क्षण तक इस उम्मीद से जूझती
रही — महेंद्र कभी तो समझेगा कि मेरा प्रेम क्या है?

एक तरफ महेंद्र मूमल की प्राचीन कथा, दूसरी ओर निशा-राजेश की नई लव स्टोरी। निशा और राजेश कुछ साल तक प्रेम संबंध में रहे, पर यह प्रेम था ही नहीं। एक स्त्री अपने बीते रिश्तों को भुलाने के लिए अपना ठहराव ढूंढ़ रही थी और दूसरी तरफ पुरुष अपना प्रेम तलाश रहा था। कटुता, आरोपों और ग्लानियों के बीच दोनों अलग हो गए। चार साल से वह नहीं मिले। कभी दिखे भी एक-दूसरे को अजनबियों की तरह। दोनों अलग होकर भी जुदा नहीं हुए। उनकी स्मृतियों में वह समय, वह साथ ठहरा हुआ है। हां, उनके लिए उसके मोल अलग अलग हैं। पुरुष को प्रतीक्षा है, वह लौटेगी। स्त्री जानती है — उसका फिर वहां आना संभव नहीं।

इच्छाएं अपनी यात्राओं के रोड मैप स्वयं तैयार करती हैं। यहां कोई स्थायी भाव होना जरूरी नहीं। आवश्यक नहीं है कि कोई तथ्य हो, प्रमाण हो, किसी तरह की गारंटी हो, बस मन की उड़ान होती है। एक दिन, भोर के ठीक बाद, राजेश का फोन बजा। दूसरी तरफ निशा थी, यह कहते हुए — सुनो, तुम कभी हरिद्वार में रहे थे न! आज मैं यहां से गुजरी तो सोचा, कुछ जानकारी ले लूं। न, न.. कुछ भी चमत्कारिक नहीं हुआ था। वहां कोई जुड़ाव भी न था। राजेश को पता था, निशा नहीं आएगी कभी, पर वह खुशी से नहा गया। अव्वल, यहां कोई स्पष्ट आशा भी नहीं थी, पर भरोसा जागा — निशा की याद में उसका नाम बाकी है।

एक उदास शाम के साए में

शाम के घर पर जुगनुओं की बारात आ रुकी थी। मोहित के लिए सांसें लेना भी मुश्किल था। याद और रात की रिश्तेदारी शायद बहुत पुरानी है, उतनी ही, जितनी कि कायनात। आज उसे फिर रागिनी की याद आ रही थी। एस्प्रेसो कॉफी और उन दोनों का साथ, लेकिन अब रागिनी कहीं नहीं थी। दूर-दूर तक नहीं। एक वक्त था, जब उसके सेलफोन के मिस्ड, रिसीव्ड और डायल्ड कॉल रिकॉर्ड में रागिनी के नाम से ही सारी एंट्रीज पटी होती थीं और अब कहां, इनबॉक्स में आखिरी संदेश भी तीन साल पुराना..! ‘क्यों सोचता हूं मैं उसके बारे में इतना, इस शिद्दत के साथ’ — यह सोचा मोहित ने, फिर उसी याद में डूब गया। दिल के किसी कोने में शायद ज़िन्दगी की बाकी दुश्वारियां और जरूरतें थमी हों, पर बाकी पूरा का पूरा मन मुकम्मल याद है। ये हालत केवल मोहित की नहीं है। लोग उन्हीं यादों के साए में गुमशुदा रहते हैं, जिनका उनके आज से कोई ताल्लुक नहीं होता। यादें गुजरा कल हैं — यह बात जितनी जल्दी जेहन में दर्ज कर ली जाए, उतना ही अच्छा, लेकिन ‘बेखुदी में बस तुमको पुकारे चले गए’ नगमा जितना सुरीला है, उतना ही कड़वा सच है यह कि कुछ लोगों की ज़िन्दगी में आज और आने वाले कल के मायने बहुत कम हैं और गुजरे कल के सबसे ज्यादा। यह भी मन को समझाने की कोशिश ही है — कल वह फिर लौटेगा, जिसके साथ गुजारा हर लम्हा जन्नत से भी ज्यादा खूबसूरत और शहद से ज्यादा मीठा था!

सुंदर मुंदरिए हो.. दुल्ला भट्टी वाला हो

वैसे, उम्मीद प्रेमी प्रेमियों के खाते में दर्ज कोई सुनहरा भर नहीं है। आशा का रिश्ता कभी कभार समय और समाज के पार भी होता है। लोहड़ी के पर्व के साथ जुड़ा एक अफसाना दोहराते हैं। आपने सुना होगा, इस दिन स्त्रियां और बच्चे गुनगुनाते हैं — सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौण विचारा होए दुल्ला भट्टी वाला हो..। कौन है सुंदरी? दुल्ला भट्टी किसका नाम है? नहीं, नहीं, ये प्रेमी या प्रेमिका नहीं। एक बेटी है, दूसरा उसका धर्म पिता। बहुत पुरानी कहानी है। पंजाब के एक की कन्या सुंदरी के रूप गुणों की चर्चा गंजीबार के राजा ने सुनी और वह मुग्ध हो गया। उसने सुंदरी के पिता को संदेश भेजा — अपनी बेटी को हमारे रनिवास में भेज दो और बदले में जो चाहो, धन ले लो।

दुखी और भयभीत की मदद दुल्ला भट्टी ने की। उसने सुंदरी को अपनी बेटी माना और रात ओ रात उसकी शादी करा दी। नाराज राजा ने दुल्ला भट्टी के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी, लेकिन दुल्ला को मिले नैतिक समर्थन और उसकी हिम्मत के आगे राजा पराजित हो गया। इस खुशी में लोगों ने अलाव जलाया, भंगड़ा किया और खुशी में जोर-जोर से नारे लगाए।

एक सवाल मन में उभरा होगा.. यहां कौन-सी आस की बात कही जा रही है? है न उम्मीद और वह भी एक समय की नहीं, बल्कि युग-युगांतर की, जन्मों-जन्मों की। एक ऐसी आशा, जिसे समय का पहिया भी धुंधला नहीं कर पाया। पूरा देश मनाता है इस उम्मीद का जश्न, लोहड़ी के दिन। हम सब सोचते हैं कहीं न कहीं मन में, जब जब किसी सुंदरी पर संकट आएगा तो कोई न कोई दुल्ला आगे आएगा।

यूं, बात थोड़ी काल्पनिक सी लगेगी, मन में यह ख्याल भी उभरेगा — यह दिवास्वप्न से ज्यादा क्या है, लेकिन इसका जवाब यही है — मन ख्वाबों की दुनिया में ही चहलकदमी करता है और उम्मीदें तर्क की धरती से अलग, एक इंद्रधनुषी कैनवास पर चाहत के चित्र बनाया करती हैं।

आशाओं के, स्वप्नों के इस संसार की पूरी बनावट उलझावों से भरपूर है। यहां गणित नहीं है, विज्ञान भी नहीं, बस भावना का ही हर तरफ विस्तार है। प्यार के, कई बार तुनकमिजाजी के, चंद लम्हो में थोड़े से दुराव और अलगाव के और फिर आकुल होकर एक दूसरे से मिल जाने की इच्छा के तार ही बनाते हैं कल्पना में यह संसार।

सपनों की दुनिया में इच्छाओं की रेलगाड़ी चलती ही जाती है, वह भी डीजल या इलेक्ट्रिक ट्रेन की मानिंद नहीं, छुक-छुक करती कोयले की रेलगाड़ी की तरह। स्वप्न जागते हैं, जलते-बुझते हैं, बिजली के लट्टुओं की मानिंद, ऐन जुगनुओं जैसे। तभी तो, आपके साथ हुआ होगा ऐसा — रातभर एक आवाज सुगबुगाहट की शक्ल में पीछा करती रही होगी। अंधेरे में शरमा, बादल आकाश की लाली में घुल गए होंगे। निगाह में बस पुलक होगी और होगी तार पर लटकी हुई एक चिंदी-चिंदी पतंग। पतंग उड़ नहीं सकती, आप जानते हैं, फिर भी तलाशने लग जाएंगे, मुंडेर के सहारे टिकाकर रखी मंझे की चरखी!

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कृष्ण की तरह जियो जिंदगी !!

Krishna, Balaram tend the cows

जिंदगी के मायने तलाशते हुए कभी आपने इस बात पर ध्यान दिया है कि कोई व्यक्ति पूर्ण व्यक्तित्व कब बन जाता है? एक मामूली से शख्स के मुकम्मल शख्सियत बनने की यात्रा को गौर से देखिए। आप पाएंगे कि सुख-दुख, उतार-चढ़ाव, हंसी-निराशा और प्रेम द्वेष जैसे कितने ही झंझावात से जूझते हुए किसी की पूरी जिंदगी बनती है, बुनी जाती है। हम बार-बार कहते रहे हैं कि जीवन का मतलब सांसों का आना-जाना नहीं होता। जब तक जिंदगी में उद्देश्य नहीं होता, नजरिया साथ नहीं चलता, तब तक जीवन का कोई अर्थ नहीं बनता। जिंदगी असल मायने में क्या है, यह बात जाननी हो तो कृष्ण को पढ़िए, कृष्ण को समझिए। आप कहेंगे कि कृष्ण देवता हैं, उनके बारे में क्या कहा जाए! नहीं, ऐसा मान लेना किसी एक संदर्भ में तो सही हो सकता है, लेकिन गोविंद की पूर्ण व्याख्या यह नहीं है।

कृष्ण संपूर्णता का नाम हैं। कृष्ण मनुष्य हैं। देवता हैं। स्पष्ट हैं। रहस्य हैं। योगिराज हैं। गृहस्थ हैं। संत हैं। योद्धा हैं। चिंतक हैं। संन्यासी हैं। लिप्त हैं। निर्लिप्त हैं। शिशु हैं तो संकट में हैं। किशोर हैं तो युद्ध कर रहे हैं। युवा हैं तो महाभारत की दिशा तय कर रहे हैं। देव होने के बावजूद चमत्कार नहीं करते। सच तो यह है कि कृष्ण केवल कर्म करते हैं। कर्म पर ही विश्वास करते हैं और इसी की सीख देते हैं।

जिंदगी की मुकम्मल परिभाषा समझने के लिए कृष्ण भाव को परखने और उसमें अंतर्निहित संदेश को कार्य-व्यवहार में उतारने की बेहद जरूरत है। आइए, कृष्ण चरित्र और उनके व्यक्तित्व को शुरुआत से समझने की कोशिश करते हैं। एक शिशु, जिसके जन्म से पहले उसकी हत्या की बिसात बिछाई जा चुकी है। जन्म लेने के तुरंत बाद उसे जैविक माता-पिता से दूर कर दिया गया। पलना-बढ़ना एक ऐसे घर में, जहां कोई रक्त संबंध नहीं है। बचपन में ही कितनी ही साजिशों से जूझना पड़ा। एक तरह से कृष्ण की पूरी शख्सियत से युद्ध करते हुए ही सुदृढ़ होती है। कंस से लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। पहले उसके भेजे दुष्ट आक्रमणकारियों से युद्ध, फिर इंद्र को चुनौती और अंतत: कंस का संहार। कृष्ण के पूरे व्यक्तित्व की एक खास बात को हम बार-बार देखते हैं, वह यह है कि वे माया-मोह के बंधनों से अलग हैं। कंस उनका संबंधी था और महाभारत के समय कौरवपांडव, दोनों निकट के रिश्ते के, लेकिन कृष्ण यह जानते हैं कि धर्म की रक्षा करने के लिए संबंधों के जाल में फंसने की जगह कर्तव्य की पुकार सुनना आवश्यक है।

अगर इसी तथ्य को अपने जीवन में उतारना हो तो संदेश स्पष्ट है — किसी भी गलत बात को स्वीकार न करें। भले ही वह बात, आदेश या नीति बड़ी से बड़ी ओर से क्यों न आई हो! दूसरा संदेश यह है कि अपने कर्तव्य के आड़े कितना ही निकट का व्यक्ति क्यों न हो — उसे राह का रोड़ा न बनने दें। यहां व्यक्ति का मतलब दूसरे का होना ही आवश्यक नहीं है। यदि अपने मन का अहंकार भी अच्छे काम में बाधा बन रहा हो तो उसका भी शमन किया जाना चाहिए।

अक्सर लोग कृष्ण के बारे में कहते हैं कि वे बहुत-सी पत्नियों के पति और एक बड़े कुटुंब के अगुआ थे। बहुधा यह बात आलोचना की तरह कही जाती है, लेकिन एक विशिष्ट अर्थ को ग्रहण नहीं किया जाता। कृष्ण का नेतृत्व, उनके अंदर निहित संतुलन की शक्ति को ही दरअसल रेखांकित किया जाना चाहिए। हम योगी, भोक्ता, नेता, सेनानी, विद्वान, चिंतक और निर्णायक होने के गुण अगर व्यक्तित्व में समाहित कर पाएं तो न सिर्फ संसार को जी सकेंगे, बल्कि जीवन के होने का मतलब भी बूझ सकेंगे। ऐसा होने पर ही जीवन का उद्देश्य निर्धारित होगा।

कृष्ण संपूर्णता का नाम हैं। कृष्ण मनुष्य हैं। देवता हैं। स्पष्ट हैं। रहस्य हैं। योगिराज हैं। गृहस्थ हैं। संत हैं। योद्धा हैं। चिंतक हैं। संन्यासी हैं। लिप्त हैं। निर्लिप्त हैं। शिशु हैं तो संकट में हैं। किशोर हैं तो युद्ध कर रहे हैं। युवा हैं तो महाभारत की दिशा तय कर रहे हैं।